भारतीय लेखा परीक्षा तथा लेखा विभाग का इतिहास

नियत्रंक तथा महालेखा परीक्षक के कार्यालय की शुरूआत 1858 में हो चुकी थी जब भारत में ब्रिटेन का शासन चला रही ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से शासन का नियंत्रण ब्रिटिश ताज ने अपने हाथ में ले लिया। पहले महालेखा परीक्षक (सर एड़र्वड) की नियुक्ति 1860 में की गई जो लेखापरीक्षा तथा लेखा दोनों कार्य करते थे। लेखापरीक्षा तथा लेखा विभाग की स्थापना (पुर्नगठन) 1862 में हुई।

भारत सरकार अधिनियम 1919, ने भारत के ‘’महालेखापरीक्षक’ को भारत से प्राप्त होने वाले राजस्व तथा खर्च के लेखापरीक्षण का उतरदायित्व प्रदान किया। यह अधिनियम लेखा परीक्षा विभाग के लिए एक ऐतिहासिक घटना साबित हुआ क्योंकि इससे महा लेखापरीक्षक को कानूनी मान्यता प्राप्त हो गई। भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत, इसे भारत के महालेखा परीक्षक के रूप में नामकरण किया गया तथा उसकी नियुक्ति इग्लैंड के राजा द्वारा की गई। जो आने वाले वर्षों में पद की स्वतंत्रता को बढाने वाला सिद्ध हुआ। भारत सरकार अधिनियम 1935, ने महालेखा परीक्षक की नियुक्ति तथा सेवा शर्तों के निर्धारण का प्रावधान भी किया। 1936 के लेखापरीक्षा तथा लेखा आदेश में लेखांकन के कार्यों को विस्तार से निर्दिष्ट किया गया। स्वंतत्रता प्राप्ति के पश्चात् लेखापरीक्षा विभाग को चार श्रेणियों में विभाजित करके चार क्षेत्रीय कार्यालय सिविल ऑडिट, डाक तथा तार (P&T), रेल ऑडिट तथा रक्षा ऑडिट अस्तित्व में आए। भारत के प्रथम नियंत्रक तथा महोलखा परीक्षक श्री नरहरि राव द्वारा विभाग को सुदृढ़ बनाने की पांच वर्षीय योजना के तहत विभाग में गहन सुधार किए गए। 1947 तक विभिन्न प्रदेशों के लिए संघीय लेखापरीक्षा की अवधारणा को केंद्र और राज्य दोनों के लिए एकल लेखा परीक्षक को सतत बना दिया। स्वतंत्र भारत के संविधान के तहत चार प्रमुख अनुच्छेद 148, 149, 150, तथा 151 भारत के नि. तथा म. ले. संस्था की आधारभूत सरंचना की व्याख्या करते हैं।

इन अनुच्छेदों के तहत, नि. तथा म. प. के कार्यों का मूल तत्त्व समान ही रहा कि- भारत का नि.म.प. एक स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण है जो न तो विधायिका तथा न ही कार्यपालिका का हिस्सा है. यधपि इनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथापि इन्हें केवल महाभियोग प्रस्ताव द्वारा ही हटाया जा सकता है। नि. म. प. केंद्र तथा राज्य दोनों के लिए लेखापरीक्षा तथा लेखाकंन दोनों का प्राधिकरण है।

1976 में केंद्र के मामलों में इसे लेखांकन कार्य से हटा दिया गया तथा इसे लेखा महानियंत्रक (भारत सरकार के प्रमुख लेखांकन प्रधिकरण) को सौंप दिया गया। जबकि राज्य के लेखांकन नि. तथा म. प. द्वारा ही किए गए। 1976 से 1989 के दौरान बहुत सारे हकदारी कार्य राज्य सरकारों को सौप दिए गए। संविधान के प्रावधानों के संदर्भ में, नियत्रंक तथा महालेखा परीक्षक (क .श. से.) अधिनियम 1971, जो कि भारत के नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक के कर्तव्य, शक्तियों तथा सेवा की शर्तों से संबधित है, को लागू किया गया। पिछले कुछ वर्षों में विभाग के कार्यों तथा गतिविधियों में सरकार की नीतियों के विकास, केन्द्रिकृत विकास योजनाओं विकासात्मक कार्यो में होने वाले खर्चे में वृद्धि तथा क्षेत्रीय परिव्यय तथा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम के त्वरित विकास के कारण आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई है। कुछ अन्य विकास कार्य जिनमे राजस्व लेखा परीक्षा तथा देश भर के निष्पादन लेखा परीक्षा के प्रमुख कार्यक्रमों की सॅँख्या में वृद्धि हुई है जिस कारण भा. ल. तथा ले. वि. के कुशल श्रमबल की माँग में वृद्धि हुई है। विभिन्न कार्यात्मक लेखापरीक्षा शाखाएँ- जैसे प्रतिरक्षा, डाक तथा दूर संचार, वाणिज्यिक, विज्ञान और तकनीकी तथा रेलवे लेखापरीक्षा अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं, जो कि भा. ले. तथा ले. से. के अधिकारियों द्वारा संचालित की जा रही है।

वर्ष 1984 में राज्य के मौजूदा लेखा परीक्षा तथा लेखा कार्यालय लेखांकन तथा हकदारी कार्यों के आधार पर दो भागों में विभाजित हो गए। विभाजन हो जाने से यह स्पष्ट हो गया कि वह कार्यालय जो लेखांकन स्वीकार करता है, अब उनका लेखा परीक्षण नहीं करेगा, इससे लेखा परीक्षा की स्वंतत्रता में और वृद्धि हुई जिससे विश्वसनीयता का सर्वोच्च स्तर तथा पारदर्शिता सुनिश्चित हुई। इस पर भा. ले. तथा ले. वि. के कामकाज पर निगरानी रखने के लिए महानिदेशक निरीक्षण के एक कार्यालय का निर्माण किया गया। 1986 में क्षमता निर्माण तथा कौशल विकास को प्रशिक्षण विभाग की स्थापना के बाद प्रोत्साहन मिला।

नि. तथा महालेखा परीक्षक ने मार्च 1999 में एक लेखा परीक्षा सलाहकार बोर्ड की स्थापना की। नि. तथा म.प. के (क.श. से.) अधिनियम की धारा 23 का अनुसरण करते हुए 2007 में लेखापरीक्षा एवं लेखांकन नियम बनाए गए तथा अधिसूचित किए गए। ये नियम वर्तमान लेखा परीक्षा कार्यों के साथ तालमेल करते है, विभिन्न अवधारणाओं की व्याख्या करते है तथा लेखा परीक्षा के क्षेत्र को परिभाषित करते है। 2012 में भा. ले. तथा ले. वि. का व्यापक पुर्नगठन किया गया। इसके पीछे यह तर्क दिया गया कि भा. ले. तथा ले. वि. के तहत लेखा परीक्षा प्राधिकरण के अन्तर्गत लेखा परीक्षा से संबधित सभी मंत्रालयों, उनके स. क्षे. अ. तथा स्वायत निकायों का एकीकरण करना है।

वर्तमान कुछ वर्षों से भारत के एस. ए. आई ने भ. ले. वि. को इंटोसाई तथा एसोसाई तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलवा कर इसकी विश्वसनीयता को ओर भी बढा दिया है। इसके अतिरिक्त 1992 में संयुक्त राष्ट्र लेखा परीक्षक बोर्ड में कैग के चुनाव से तथा कैग द्वारा कई अंतर्राष्ट्रीय निकाय जैसे – विश्व व्यापार संगठन,विश्व स्वास्थ्य संगठन, खाध और कृषि संगठन का लेखापरीक्षण करने से भारत के नियत्रंक तथा महालेखापरीक्षक की विश्वसनीयता दोगुनी हो गई है। 2014 में भारत के सर्वोच्च लेखा परीक्षा संस्थान को संयुक्त राष्ट्र के लेखा परीक्षा बोर्ड मे छः वर्ष के लिए नियुक्त किया गया।

काम के महत्व को आकर्षक बनाने के लिए विभाग ने अवसंरचना तथा अन्य सुविधाओं में उल्लेखनीय सुधार किए हैं, जो न केवल सौंदर्य के अनुसार आकर्षक है बल्कि पर्यावरण के अनुकुल तथा प्रचलन (trend) के अनुसार है। भा. ले. तथा ले. वि. लेखा परीक्षण की नई विधाओं के विकास द्वारा लगातार उत्कृष्ठता की ओर बढ़ रहा है। आने वाले वर्षो में लेखा परीक्षा विभाग निः सदेंह अधिक सक्षम तथा कुशल विभाग बनने वाला है।